
भारत में कोर्ट मैरिज कैसे करें: नियम, जरूरी कागजात, फीस और पूरा प्रोसेस
जब दो बालिग लोग अपनी पसंद से एक साथ जिंदगी बिताने का फैसला लेते हैं, तो कई बार समाज, जाति या परिवार की बंदिशें आड़े आ जाती हैं। ऐसे हालात में कानून आपको अपनी मर्जी से शादी करने का पूरा अधिकार और सुरक्षा देता है। भारत में बिना किसी धार्मिक रस्म-रिवाज के, शांति और कानूनी तरीके से शादी करने का सबसे भरोसेमंद रास्ता है- कोर्ट मैरिज।
लेकिन कोर्ट मैरिज का नाम सुनते ही ज्यादातर कपल्स के मन में कई तरह की शंकाएं पैदा हो जाती हैं। जैसे- क्या शादी की सूचना घर वालों को भेजी जाती है? क्या सिर्फ एक दिन में कोर्ट मैरिज होना मुमकिन है? गवाह कौन बन सकता है? और इसमें कितना पैसा खर्च होता है?
अगर आप भी कानूनी रास्ते से शादी करने की तैयारी कर रहे हैं, तो किसी एजेंट या दलाल के झांसे में आने से पहले यह जान लीजिए कि भारत में court marriage process in india जमीनी स्तर पर कैसे काम करता है।
सबसे बड़ा भ्रम: कोर्ट मैरिज और मैरिज रजिस्ट्रेशन में क्या फर्क है?
अदालतों के बाहर बहुत से लोग एक साधारण बात में उलझ जाते हैं। वे मंदिर या आर्य समाज में शादी करके उसका रजिस्ट्रेशन करवा लेते हैं और उसे ही कोर्ट मैरिज समझ बैठते हैं। कानूनी नजरिए से ये दोनों दो अलग बातें हैं:
- असली कोर्ट मैरिज: यह देश के special marriage act 1954 के तहत होती है। इसमें न तो कोई फेरे होते हैं, न निकाह पढ़ा जाता है और न ही किसी पादरी की जरूरत होती है। लड़का और लड़की सीधे मैरिज ऑफिसर (रजिस्ट्रार) के सामने पेश होते हैं और 3 गवाहों की मौजूदगी में एक-दूसरे को पति-पत्नी स्वीकार करते हैं।
- धार्मिक विवाह का रजिस्ट्रेशन: इसमें पहले किसी धार्मिक रीति से शादी की जाती है (जैसे हिंदू रीति से सात फेरे या आर्य समाज मंदिर में विवाह)। उसके बाद उस शादी का सरकारी सबूत पाने के लिए उसे हिंदू मैरिज एक्ट या संबंधित पर्सनल लॉ के तहत सिर्फ रजिस्टर कराया जाता है।
अगर लड़का और लड़की अलग-अलग धर्म के हैं और दोनों में से कोई भी अपना धर्म नहीं बदलना चाहता, तो उनके लिए स्पेशल मैरिज एक्ट वाली कोर्ट मैरिज ही एकमात्र और सबसे सुरक्षित विकल्प है।
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शादी के जरूरी नियम (Court Marriage Rules in Hindi)
अगर आप यह जानना चाहते हैं कि कोर्ट मैरिज कैसे करें, तो सबसे पहले यह देखना होगा कि आप दोनों कानून द्वारा तय की गई इन बुनियादी शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं:
1. उम्र की कानूनी सीमा
शादी के दिन लड़के की उम्र कम से कम 21 साल पूरी होनी चाहिए और लड़की की उम्र कम से कम 18 साल। अगर आपकी उम्र में एक दिन भी कम है, तो रजिस्ट्रार आवेदन को सीधे रिजेक्ट कर देगा।
2. पहले से कोई शादी चालू न हो
शादी के वक्त दोनों में से किसी का भी पहले से कोई जीवित पति या पत्नी नहीं होना चाहिए। अगर किसी का पहले विवाह हुआ था, तो उसका कानूनी रूप से तलाक हो चुका हो और हाथ में कोर्ट की तलाक डिक्री (Divorce Decree) हो। अगर पहले जीवनसाथी की मौत हो चुकी है, तो उनका डेथ सर्टिफिकेट लगाना होगा।
3. मानसिक रूप से स्वस्थ होना
लड़का और लड़की दोनों इस स्थिति में हों कि वे शादी का मतलब समझ सकें और अपनी स्वतंत्र सहमति दे सकें। किसी बीमारी या नशे की हालत में कराया गया विवाह अमान्य माना जाता है।
4. प्रतिबंधित रिश्ते (खून का संबंध)
कानून के अनुसार दोनों पक्ष आपस में ऐसे करीबी खून के रिश्ते में नहीं होने चाहिए जहां शादी वर्जित हो। जैसे सगे भाई-बहन, चचेरे, ममेरे या मौसेरे भाई-बहन के बीच विवाह को कानून सामान्य तौर पर मान्यता नहीं देता, जब तक कि उनके समुदाय के रीति-रिवाजों में इसकी पुरानी परंपरा न हो।
कौन-कौन से कागजात साथ रखने होंगे? (Court Marriage Documents)
कोर्ट में कोई भी कानूनी काम बिना पुख्ता कागजात के आगे नहीं बढ़ता। अगर किसी एक भी डॉक्यूमेंट में नाम या जन्मतिथि की गलती होगी, तो फाइल अटक सकती है। इसलिए आवेदन करने से पहले इन कागजातों की फाइल तैयार कर लें:
वर और वधू के लिए जरूरी दस्तावेज:
- उम्र का पक्का सबूत: 10वीं क्लास की मार्कशीट, जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate) या पासपोर्ट।
- पते का प्रमाण: आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, राशन कार्ड या बिजली का बिल।
- पहचान पत्र: पैन कार्ड या आधार कार्ड।
- पासपोर्ट साइज फोटो: दोनों के कम से कम 5-5 हाल के साफ पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ।
- तलाकशुदा होने की स्थिति में: सक्षम फैमिली कोर्ट द्वारा जारी की गई तलाक की मूल डिक्री।
- विधवा या विधुर होने की स्थिति में: पूर्व जीवनसाथी का मृत्यु प्रमाण पत्र।
- शादी की पूर्व सूचना का निर्धारित फॉर्म (Notice of Intended Marriage), जिस पर दोनों के दस्तखत हों।
काम की बात: अगर आपके आधार कार्ड और 10वीं की मार्कशीट में नाम या पिता के नाम की स्पेलिंग में कोई अंतर है, तो पहले ही किसी नोटरी से एक हलफनामा (Affidavit) बनवाकर रख लें, ताकि बाद में कोई अड़चन न आए।
3 गवाहों के लिए जरूरी दस्तावेज:
कोर्ट मैरिज में 3 बालिग गवाहों का होना अनिवार्य है। गवाहों के पास ये कागजात होने चाहिए:
- पहचान पत्र (आधार कार्ड, पैन कार्ड या वोटर आईडी)
- पते का प्रमाण
- 2-2 पासपोर्ट साइज फोटो
कोर्ट मैरिज का पूरा प्रोसेस (Step-by-Step)
विशेष विवाह अधिनियम के तहत कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया कुल 4 से 5 चरणों में पूरी होती है। इसमें आम तौर पर 30 से 40 दिन का समय लगता है:
स्टेप 1: मैरिज ऑफिसर के पास नोटिस जमा करना
सबसे पहले आपको उस जिले के विवाह अधिकारी (Marriage Officer / SDM / ADM) के दफ्तर में जाकर शादी की पूर्व सूचना का नोटिस देना होता है।
नियम: लड़का या लड़की में से कम से कम कोई एक व्यक्ति उस जिले में नोटिस देने की तारीख से पहले कम से कम 30 दिनों से लगातार रह रहा हो। इसके सबूत के तौर पर वहां का एड्रेस प्रूफ या रेंट एग्रीमेंट लगाना होता है।
स्टेप 2: 30 दिन का नोटिस पीरियड (आपत्ति का समय)
जब आप अपनी फाइल और फीस जमा कर देते हैं, तो मैरिज ऑफिसर उस नोटिस की एक कॉपी अपने दफ्तर के सार्वजनिक नोटिस बोर्ड पर लगा देता है।
यह नोटिस ठीक 30 दिनों तक लगा रहता है। कानून यह 30 दिन का समय इसलिए देता है ताकि अगर किसी को इस शादी पर कोई कानूनी आपत्ति हो, तो वह अपनी बात रख सके। आपत्ति सिर्फ कानूनी आधार पर हो सकती है—जैसे लड़का पहले से शादीशुदा है या लड़की नाबालिग है। कोई सिर्फ इसलिए शादी नहीं रोक सकता कि उसे यह रिश्ता पसंद नहीं है।
स्टेप 3: घर पर नोटिस जाने का सच
अक्सर कपल्स इस बात से बहुत डरते हैं कि क्या 30 दिन के इस नोटिस की चिट्ठी उनके माता-पिता के घर भेजी जाएगी?
इस मामले में स्थिति अब काफी बदल चुकी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट समेत कई अदालतों ने अपने फैसलों में साफ कहा है कि बालिग जोड़ों के घर पर नोटिस भेजना उनकी व्यक्तिगत आजादी और प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए अब ज्यादातर जगहों पर नोटिस केवल मैरिज ऑफिसर के नोटिस बोर्ड पर ही लगाया जाता है, घर पर जबरन चिट्ठी नहीं भेजी जाती।
स्टेप 4: कोर्ट में हाजिरी और शपथ
अगर 30 दिनों के अंदर कोई कानूनी आपत्ति नहीं आती, तो 30 दिन खत्म होते ही मैरिज ऑफिसर आपको कोर्ट में हाजिर होने की एक तारीख देता है।
तय तारीख पर लड़का, लड़की और तीनों गवाहों को मैरिज ऑफिसर के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़ता है। वहां सबके ओरिजिनल डॉक्यूमेंट चेक किए जाते हैं। इसके बाद दोनों पक्षों से एक घोषणा पत्र (Declaration) पर दस्तखत करवाए जाते हैं कि वे बिना किसी डर, लालच या दबाव के अपनी मर्जी से यह विवाह कर रहे हैं।
स्टेप 5: मैरिज सर्टिफिकेट जारी होना
शपथ और दस्तखत की औपचारिकता पूरी होते ही विवाह अधिकारी अपने मैरिज रजिस्टर में शादी दर्ज कर लेता है। उस रजिस्टर पर लड़का, लड़की, तीनों गवाह और खुद मैरिज ऑफिसर साइन करते हैं। इसके तुरंत बाद आपको सरकारी कोर्ट मैरिज सर्टिफिकेट सौंप दिया जाता है। यह सर्टिफिकेट देश और दुनिया के हर कोने में आपकी शादी का सबसे मजबूत कानूनी प्रमाण होता है।
क्या 1 दिन में कोर्ट मैरिज होना सच है?
आपने कई बार इंटरनेट पर, अखबारों के विज्ञापनों में और अदालतों के बाहर अक्सर लिखा दिखता है- “सिर्फ 2 घंटे में कोर्ट मैरिज करें”, “1 दिन में कोर्ट मैरिज सर्टिफिकेट पाएं”.
इसकी असलियत समझ लीजिए ताकि आप किसी धोखे का शिकार न हों।
special marriage act 1954 के तहत 30 दिन का कानूनी नोटिस पीरियड अनिवार्य है। भारत का कोई भी वकील, जज या एसडीएम इस 30 दिन के समय को एक दिन में नहीं बदल सकता।
फिर वकील 1 दिन में क्या करवाते हैं?
जो लोग 1 दिन में शादी करवाने का दावा करते हैं, वे असल में स्पेशल मैरिज एक्ट वाली कोर्ट मैरिज नहीं कराते। वे उसी दिन आपको किसी रजिस्टर्ड आर्य समाज मंदिर या ट्रस्ट में ले जाकर धार्मिक रीति से शादी करवाते हैं। मंदिर से शादी की रसीद और प्रमाण पत्र मिलने के तुरंत बाद, वे उसी दिन आपको रजिस्ट्रार ऑफिस ले जाकर उस शादी का रजिस्ट्रेशन (Marriage Registration) करवा देते हैं।
यह तरीका भी कानूनी रूप से पूरी तरह वैध है, लेकिन याद रहे कि यह कोर्ट मैरिज नहीं बल्कि ‘आर्य समाज विवाह का सरकारी पंजीकरण’ कहलाता है।
गवाह (Witnesses) को लेकर जरूरी नियम
बहुत से जोड़ों को गवाह जुटाने में सबसे ज्यादा परेशानी होती है। गवाहों को लेकर कानून के नियम बिल्कुल साफ हैं:
- गवाह कोई भी हो सकता है- आपके दोस्त, साथ काम करने वाले साथी, रिश्तेदार या पड़ोसी।
- गवाह का बालिग (18 साल से ऊपर) होना जरूरी है।
- गवाह के पास अपना ओरिजिनल आधार कार्ड या कोई वैध सरकारी पहचान पत्र होना चाहिए।
- सबसे जरूरी बात: कोर्ट मैरिज में माता-पिता का गवाह बनना या उनकी मंजूरी होना कतई जरूरी नहीं है। अगर दोनों पक्ष बालिग हैं, तो वे अपने दोस्तों को गवाह बनाकर कानूनी रूप से शादी कर सकते हैं।
कोर्ट मैरिज में कितना खर्चा आता है?
कोर्ट मैरिज का खर्चा दो हिस्सों में बंटा होता है:
- सरकारी फीस: अगर आप खुद एसडीएम या मैरिज रजिस्ट्रार के दफ्तर जाकर फॉर्म भरते हैं, तो सरकारी फीस बहुत मामूली होती है। अलग-अलग राज्यों में यह फीस ₹500 से लेकर ₹2,000 के बीच होती है।
- वकील का खर्च: चूंकि आम लोगों को कानूनी ड्राफ्टिंग, शपथ-पत्र (Affidavit) बनवाने और फाइलों को सही क्रम में लगाने का अनुभव नहीं होता, इसलिए ज्यादातर लोग किसी वकील की सेवाएं लेते हैं। वकील की फीस शहर, केस की स्थिति और कागजी कार्रवाई के हिसाब से आमतौर पर ₹10,000 से लेकर ₹25,000 तक हो सकती है।
अगर परिवार से जान का खतरा हो तो क्या करें?
अगर आप दोनों बालिग हैं और अपने घर वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी कर रहे हैं, तो भारतीय कानून आपको पूरी सुरक्षा देता है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़े मामलों (जैसे लता सिंह बनाम यूपी राज्य और शक्ति वाहिनी केस) में सख्त निर्देश दिए हैं कि दो वयस्कों को अपनी मर्जी से शादी करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है और कोई भी पंचायत या परिवार उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकता।
अगर आपको परिवार से धमकियां मिल रही हैं, तो आप ये कदम उठा सकते हैं:
- एसपी ऑफिस में अर्जी: शादी का नोटिस देते ही या शादी होते ही आप अपने जिले के पुलिस अधीक्षक (SP या DCP) को एक लिखित शिकायत देकर जान का खतरा बता सकते हैं और सुरक्षा मांग सकते हैं।
- हाई कोर्ट से प्रोटेक्शन: अगर स्थानीय पुलिस से मदद न मिले, तो आप सीधे अपने राज्य के हाई कोर्ट में वकील के जरिए रिट पिटीशन (Protection Petition) दाखिल कर सकते हैं। हाई कोर्ट संबंधित जिले की पुलिस को आदेश देता है कि इस जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और परिवार वालों को उनके जीवन में दखल देने से रोका जाए।
- झूठी एफआईआर से बचाव: अक्सर लड़की के घर वाले लड़के पर अपहरण (Kidnapping) की झूठी एफआईआर दर्ज करवा देते हैं। ऐसे मामलों में जैसे ही लड़की मजिस्ट्रेट के सामने 164 का बयान दर्ज कराकर यह कह देती है कि वह अपनी मर्जी से गई थी और उसने अपनी मर्जी से शादी की है, पुलिस को वह केस तुरंत बंद करना पड़ता है।
कोर्ट मैरिज सर्टिफिकेट के बड़े फायदे
कोर्ट से मिलने वाला मैरिज सर्टिफिकेट केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह आपके कई कानूनी अधिकारों की चाबी है:
- पासपोर्ट और वीजा: अगर आप शादी के बाद विदेश जाना चाहते हैं या स्पाउस वीजा (Spouse Visa) अप्लाई कर रहे हैं, तो एम्बेसी में केवल सरकारी मैरिज सर्टिफिकेट ही मान्य होता है।
- बैंक और बीमा: बैंक में जॉइंट अकाउंट खुलवाने, बीमा पॉलिसी या भविष्य निधि (PF) में अपने जीवनसाथी को नॉमिनी बनाने के लिए यह सबसे बड़ा प्रमाण है।
- संपत्ति के अधिकार: भविष्य में किसी भी तरह के पारिवारिक या संपत्ति विवाद की स्थिति में यह सर्टिफिकेट साबित करता है कि आप कानूनी रूप से विवाहित हैं।
कुछ जरूरी सावधानियां
कोर्ट मैरिज करने का फैसला आपकी जिंदगी का एक अहम मोड़ होता है। इसलिए जल्दबाजी में किसी भी अनजान बिचौलिए के हाथ में पैसे न दें। हमेशा अपने ओरिजिनल डाक्यूमेंट्स अपने पास रखें और सिर्फ उनकी फोटोकॉपी ही जमा करें। अगर कोई वकील आपसे यह कहे कि आपको कोर्ट में जाने की जरूरत नहीं है और घर बैठे सर्टिफिकेट मिल जाएगा, तो समझ जाएं कि वह फर्जीवाड़ा कर रहा है। कानूनन लड़का, लड़की और गवाहों का विवाह अधिकारी के सामने सशरीर मौजूद होना अनिवार्य है।
अगर आपके सारे कागजात सही हैं और दोनों की उम्र पूरी है, तो बिना डरे कानूनी प्रक्रिया अपनाएं। भारत का कानून हर उस नागरिक के साथ खड़ा है जो नियम के दायरे में रहकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करता है।
कोर्ट मैरिज से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या कोर्ट मैरिज के लिए माता-पिता की मौजूदगी या उनके साइन जरूरी हैं?
जवाब: बिल्कुल नहीं। अगर लड़के की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल पूरी हो चुकी है, तो कानूनन माता-पिता की सहमति या उनके दस्तखत की कोई जरूरत नहीं होती। आप अपने किन्हीं भी 3 बालिग दोस्तों या जान-पहचान वालों को गवाह बनाकर शादी कर सकते हैं।
2. क्या कोर्ट से शादी का नोटिस लड़के या लड़की के घर भेजा जाता है?
जवाब: नहीं, अब घर पर नोटिस भेजने की अनिवार्यता खत्म हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स के फैसलों के अनुसार, घर पर नोटिस भेजना प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए मैरिज ऑफिसर केवल अपने ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर ही सूचना लगाता है, घर पर कोई लेटर या पुलिस नहीं भेजी जाती।
3. क्या 3 गवाहों में हमारे दोस्त गवाह बन सकते हैं? क्या बाद में पुलिस उन्हें परेशान करेगी?
जवाब: हाँ, कोई भी बालिग व्यक्ति (जिसकी उम्र 18 साल से ऊपर हो और जिसके पास आधार कार्ड हो) गवाह बन सकता है, चाहे वह आपका दोस्त हो या सहकर्मी। गवाह बनने का मतलब सिर्फ यह प्रमाणित करना होता है कि शादी दोनों की मर्जी से हो रही है। अगर दोनों पक्ष बालिग हैं, तो पुलिस किसी भी गवाह को न तो गिरफ्तार कर सकती है और न ही बेवजह परेशान कर सकती है।
4. क्या अलग-अलग धर्म के लोग बिना धर्म बदले कोर्ट मैरिज कर सकते हैं?
जवाब: हाँ, बिल्कुल। Special Marriage Act, 1954 का मुख्य उद्देश्य ही यही है कि दो अलग-अलग धर्म या जाति के लोग बिना अपना धर्म बदले कानूनी रूप से विवाह कर सकें। इसमें न तो लड़की को धर्म बदलना पड़ता है और न ही लड़के को।
5. अगर 30 दिन के नोटिस पीरियड के दौरान परिवार वाले कोई आपत्ति (Objection) दर्ज करा दें तो क्या होगा?
जवाब: कोई भी सिर्फ इसलिए आपत्ति नहीं कर सकता कि उसे यह शादी पसंद नहीं है। आपत्ति केवल कानूनी आधार पर ही मान्य होती है—जैसे लड़का या लड़की में से कोई नाबालिग हो, किसी की पहले से शादी हो चुकी हो, या दोनों आपस में प्रतिबंधित खून के रिश्ते में आते हों। अगर परिवार की आपत्ति बेबुनियाद है, तो मैरिज ऑफिसर उसे खारिज कर देता है और शादी तय समय पर ही होती है।
6. क्या सच में 1 दिन में कोर्ट मैरिज हो सकती है?
जवाब: नहीं। स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत 30 दिन का नोटिस अनिवार्य है, इसलिए असली कोर्ट मैरिज कभी 1 दिन में नहीं हो सकती। जो वकील 1 दिन का दावा करते हैं, वे पहले आर्य समाज मंदिर या ट्रस्ट में धार्मिक शादी करवाते हैं और फिर उसी दिन उसका रजिस्ट्रेशन अप्लाई करवा देते हैं। यह तरीका भी कानूनी रूप से मान्य है, लेकिन इसे ‘धार्मिक विवाह का पंजीकरण’ कहा जाता है।
7. अगर लड़की के घर वाले लड़के पर अपहरण (Kidnapping) की एफआईआर दर्ज करा दें तो क्या करें?
जवाब: ऐसी स्थिति से बचने के लिए शादी के तुरंत बाद अपने ओरिजिनल मैरिज सर्टिफिकेट और उम्र के सबूत के साथ जिले के एसपी (SP) ऑफिस या हाई कोर्ट में सुरक्षा की अर्जी लगानी चाहिए। जब लड़की मजिस्ट्रेट के सामने बयान देती है कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से आई है, तो पुलिस को वह झूठा केस तुरंत रद्द (Close) करना पड़ता है।
8. कोर्ट मैरिज में कुल कितना सरकारी खर्च आता है?
जवाब: अगर आप खुद एसडीएम दफ्तर जाकर प्रक्रिया पूरी करते हैं, तो सरकारी फीस मात्र ₹500 से ₹2,000 के आसपास होती है। हालांकि, अगर आप कागजी कार्रवाई, शपथ-पत्र और नोटिस बनवाने के लिए किसी वकील की मदद लेते हैं, तो वकील की फीस शहर के अनुसार ₹10,000 से ₹20,000 तक हो सकती है।
9. क्या कोर्ट मैरिज के बाद लड़की को अपना सरनेम (उपनाम) बदलना जरूरी है?
जवाब: नहीं, यह पूरी तरह लड़की की मर्जी पर निर्भर करता है। भारतीय कानून में शादी के बाद सरनेम बदलना बिल्कुल भी अनिवार्य नहीं है। लड़की चाहे तो अपने सभी सरकारी दस्तावेजों (आधार, पैन, पासपोर्ट) में अपना पुराना नाम ही रख सकती है।
10. क्या कोर्ट मैरिज का सर्टिफिकेट ऑनलाइन डाउनलोड किया जा सकता है?
जवाब: दिल्ली, यूपी, महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों में अब मैरिज रजिस्ट्रेशन पोर्टल पर यह सुविधा उपलब्ध है। शादी पूरी होने और रजिस्ट्रार द्वारा अप्रूव किए जाने के बाद आप अपने एप्लीकेशन नंबर से ऑनलाइन डिजिटल साइन वाला मैरिज सर्टिफिकेट डाउनलोड कर सकते हैं।

Rajesh Kumar Singh
Advocate Rajesh Kumar Singh is a legal professional with more than 25+ years of experience in the legal field. He brings extensive professional experience to legal research, legal writing and practical understanding of Indian law.